एसिडिटी (Acidity)

एसिडिटी (Acidity): लक्षण, कारण, इलाज, उपचार और परहेज

हमारे शरीर का रक्त क्षारधर्मी होता है। उसमें सदा ही लवण जाति के कुछ अम्ल रहते हैं। जब शरीर में खाद्य की दहन क्रिया (Oxidation) भली प्रकार नहीं होती, तो उस समय आहार के विभिन्न रासायनिक पदार्थ (Urates, Sulphur, Phosphorus compounds) खून में जाकर उसकी अम्लता को बढ़ा देते हैं। रक्त का यह अम्ल-विष कई रोग पैदा करता है। जोड़ों का दर्द, गठिया रोग इसी अम्लता के कारण होते हैं। गुर्दे तथा मूत्राशय की पथरी भी इसी से होती है। जब यह विष पाकस्थली पर आक्रमण करता है या प्रकृति यह अम्ल-विष पाचन-यंत्रों के द्वारा शरीर से बाहर करना चाहती है, तो उसे अम्ल रोग (Acidity) कहा जाता है।

इस रोग में पाचन-यंत्रों से पाचक रस कुछ अधिक निकलता है, जिससे भूख कुछ अधिक लगती है। जब रोगी इस कारण से कुछ अधिक खा लेते हैं, तब साधारणतया घंटे-दो घंटे तक कुछ ठीक रहता है। इसके बाद पेट में कुछ भारी लगता है और पेट में दर्द तथा छाती में जलन होने लगती है। गला जलने लगता है और कभी-कभी उल्टी हो जाती है। उल्टी में जो बाहर निकलता है, वह पीला-हरा अम्ल तत्त्व ही होता है। बहुत बार इस रोग के बिगड़ने से पेट में घाव भी हो जाते हैं।

हमारे शरीर की शोषण-क्रिया (Matabolism) के फलस्वरूप जो विष पैदा होता है, वह सभी अम्ल जातीय पदार्थ हैं। जब वह मल, मूत्र, पसीना तथा श्वास द्वारा शरीर से बाहर नहीं होते, तब वह शरीर के भीतर रहकर शरीर का अम्ल तत्त्व बढ़ा देते हैं। हमारे शरीर को 75-80% क्षारधर्मी और 20-25% अम्लधर्मी आहार की आवश्यकता होती है और ऐसा ही आहार लेना भी चाहिए। जब हम लोग अम्लधर्मी भोजन अधिक करते हैं, (अधिकांश लोगों का भोजन अम्लधर्मी ही होता है), तब अम्ल तत्त्व बढ़ जाते हैं। सारांश में यह समझ लेना चाहिए कि शरीर का रक्त स्रोत विषाक्त न हो और पाचन कमजोर न हो, तो यह रोग कभी नहीं हो सकता।

उपचार:

कम-से-कम दो सप्ताह (एक सप्ताह नमक वाले पानी से और दूसरे सप्ताह बिना नमक के पानी से) कुंजल-क्रिया करें। इससे पाकस्थली का बहुत कुछ अम्ल बाहर हो जाएगा। रात में एक बड़ा चम्मच त्रिफला के पाउडर को पानी के साथ लेकर बाद में एक कप गर्म दूध ले लें। इससे भी पेट साफ होना चाहिए।

जब तक संभव हो सके, दिन में दो बार शरीर को अच्छी तरह तौलिए से या हाथों से रगड़कर स्नान करें। सर्दियों में हल्का गर्म पानी इस्तेमाल कर सकते हैं। बाद में सूखे तौलिए से बदन को सुखाकर 15 मिनट तक आराम करें।

योगासनों में सूर्य नमस्कार, नावासन, कमर चक्रासन, पश्चिमोत्तानासन, योग-मुद्रा, अर्धमत्स्येंद्रासन, वज्रासन, सुप्तवज्रासन, धनुरासन, पवनमुक्तासन तथा सर्वांगासन का नित्यप्रति अभ्यास करें। शक्ति के अनुसार बाद में और भी आसन जोड़ सकते हैं।
प्राणायाम में भस्त्रिका प्राणायाम (बाएं से, दाएं से, फिर दोनों से) उज्जाई प्राणायाम, अग्निसार क्रिया करें।

आहार:

अक्सर अम्ल के रोगी को डॉक्टर लोग अम्ल जाति के फल, जैसे-नीबू, संतरा, मौसमी आदि नहीं लेने की सलाह देते हैं। वास्तव में यही फल अम्ल रोग को ठीक करने में सहायता करते हैं। वैज्ञानिकों का मत है (Acid Fruits hold for the alkline reserve of body and help to cure acidity) खट्टी जाति के फल शरीर में क्षार का खजाना बढ़ाते हैं और अम्ल रोग को छुड़ाने में मदद करते हैं।

रोगी को चाहिए कि वह 3 दिन से 7 दिन तक केवल नीबू, गर्म पानी, मधु या साथ में फलों के रस का सेवन करके रहें। फिर एक सप्ताह इन्हीं रसों के साथ दोपहर व रात में सब्जी का सूप और दिन में दो बार फल खाकर बिताएं।

सुझाव:

जब आप भोजन करें, तो भोजन के साथ फ्रीज का पानी न लें, थोड़ा गर्म पानी पिएं। यदि फिर भी पेट में दर्द हो, तो भोजन के बाद बर्फ के पानी की पट्टी पेट पर रखने के बाद गर्म पानी की बोतल उस पर रखकर पेट को सेंकें।
किसी प्रकार की चटनी, अचार, कच्चे फल, खट्टे संतरे, मौसमी वगैरह नहीं खाने चाहिए। पके हुए फल, मीठे संतरे वगैरह ही लेने चाहिए।

यदि छाती में जलन हो, तो 1/2 लिटर गर्म पानी धीरे-धीरे पिएं। यदि घबराहट बढ़ जाए और दर्द असह्य हो जाए, तो थोड़ा गर्म पानी पीकर कुंजल कर लें। उससे तुरंत आराम मिलता है।

भोजन करने से पहले एक बड़ा चम्मच जैतून का तेल (Olive oil) दवाई की तरह पी जाएं। इससे यह लाभ होगा कि भोजन करने से अम्ल नहीं बनेगा और रोगी परेशान नहीं होगा।